समर न्यूज | चंडीगढ़
पंजाब के भूजल संकट के बीच नई आकलन रिपोर्ट कुछ राहत के संकेत दे रही है। राज्य में भूजल के अत्यधिक दोहन वाले ब्लॉकों की संख्या दो साल में 115 से घटकर 110 रह गई है। 153 आकलन इकाइयों में अब 110 ब्लॉक अतिदोहित, छह गंभीर, 17 अर्ध-गंभीर और 20 सुरक्षित श्रेणी में हैं। हालांकि सुधार के बावजूद राज्य की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, क्योंकि 2025-26 में पंजाब ने अपने सालाना निकासी योग्य भूजल संसाधन से कहीं अधिक पानी जमीन से निकाला।
नवीनतम गतिशील भूजल संसाधन आकलन के अनुसार, पंजाब में सालाना भूजल पुनर्भरण 19.14 अरब घन मीटर है, जबकि निकासी योग्य संसाधन 17.29 अरब घन मीटर आंका गया है। इसके मुकाबले 2025-26 में कुल 26.32 अरब घन मीटर भूजल निकाला गया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कृषि का है।
सिंचाई के लिए 24.95 अरब घन मीटर पानी जमीन से निकाला गया। राज्य में भूजल दोहन का स्तर 152.22 प्रतिशत रहा। यानी उपलब्ध टिकाऊ संसाधन की तुलना में निकासी अभी भी काफी अधिक है।
रिपोर्ट का सकारात्मक पक्ष यह है कि 153 में से 95 आकलन इकाइयों में भूजल निकासी की रफ्तार कम होने के संकेत मिले हैं। पांच ब्लॉक- गुरदासपुर, काहनूवान, माहिलपुर, कोट ईसे खां और कादियां—अतिदोहित श्रेणी से निकलकर गंभीर श्रेणी में आए हैं। इसके अलावा अर्नीवाला शेख सुभानपुर, फिरोजपुर, मखू, मामदोट, श्री हरगोबिंदपुर, बुंगा, हाजीपुर, होशियारपुर, नरोत जैमल सिंह और और ब्लॉकों में भी सुधार दर्ज किया गया है।
हालांकि हर जगह स्थिति नहीं सुधरी। उपलब्ध आकलन में फरीदकोट, रोपड़, खरड़ और बलाचौर समेत कुछ ब्लॉकों में भूजल की स्थिति खराब होने के संकेत भी सामने आए हैं। इससे साफ है कि राज्य में भूजल की तस्वीर एक समान नहीं है। जहां नहरों का पानी बेहतर तरीके से पहुंचा है, वहां ट्यूबवेल पर निर्भरता घटने की संभावना बनी है, जबकि कुछ क्षेत्रों में भूजल पर दबाव अब भी बढ़ रहा है।
नहरों तक पहुंचा पानी, ट्यूबवेल पर घटा दबाव
भूजल संकट से निपटने में नहर सिंचाई के विस्तार को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार ने नहरों के पुनर्वास और पानी को खेतों के अंतिम छोर तक पहुंचाने पर जोर दिया है। इसका सीधा उद्देश्य किसानों की सिंचाई जरूरत के लिए ट्यूबवेल से निकाले जाने वाले पानी को कम करना है। मार्च में सरकार ने नहर सिंचाई क्षेत्र को बड़े स्तर पर बढ़ाने का लक्ष्य भी रखा था। विशेषज्ञों का मानना है कि नहर का पानी तभी भूजल संरक्षण में स्थायी बदलाव ला सकता है, जब उसकी आपूर्ति नियमित, भरोसेमंद और खेतों के अंतिम छोर तक हो। पहले के सरकारी आकलनों में भी पंजाब में भूजल दोहन की गंभीर स्थिति सामने आती रही है। 2025 के आकलन में राज्य का भूजल दोहन स्तर 156.36 प्रतिशत और 111 ब्लॉक अतिदोहित पाए गए थे। जुलाई में संसद में रखे गए आंकड़ों में भी पंजाब को देश के सबसे अधिक भूजल दोहन वाले राज्यों में बताया गया था। इस लिहाज से 152.22 प्रतिशत तक गिरावट महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे संकट से बाहर निकलने का संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी।
खेती में बदलाव जरूरी
पंजाब में भूजल का सबसे बड़ा उपयोग कृषि में होता है। धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के कारण ट्यूबवेल पर निर्भरता लंबे समय से बनी हुई है। इसलिए केवल नहरों में पानी बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। फसल विविधीकरण, कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन, सूक्ष्म सिंचाई और भूजल पुनर्भरण के उपायों को साथ लेकर चलना होगा। राज्य में भूजल निकासी का स्तर 100 प्रतिशत से ऊपर रहने का अर्थ है कि प्रकृति जितना पानी दोबारा उपलब्ध करा रही है, उससे अधिक पानी निकाला जा रहा है।
स्थायी बदलाव बनाना जरूरी
95 ब्लॉकों में सुधार और अतिदोहित ब्लॉकों की संख्या में कमी निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन 110 ब्लॉकों का अब भी अतिदोहित श्रेणी में होना संकट की गंभीरता बताता है। खासकर कृषि क्षेत्र में भूजल की मांग घटाए बिना यह सुधार टिकाऊ नहीं होगा। नहरों के अंतिम छोर तक पानी पहुंचने और किसानों को भरोसेमंद वैकल्पिक सिंचाई उपलब्ध होने से ही ट्यूबवेल पर दबाव लगातार कम किया जा सकता है।
पानी बचाने की अगली परीक्षा
पंजाब के लिए अगली चुनौती सुधार की मौजूदा गति को बनाए रखना है। भूजल स्तर में कुछ स्थानों पर सुधार और निकासी की दर में कमी उम्मीद जगाती है, लेकिन राज्य की कुल निकासी अभी भी पुनर्भरण से काफी अधिक है। इसलिए नहर सिंचाई के विस्तार के साथ फसल चक्र में बदलाव और पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को प्राथमिकता देनी होगी। तभी मौजूदा राहत को भूजल
संकट से दीर्घकालिक मुक्ति की दिशा में वास्तविक बदलाव में बदला जा सकेगा।